नारी बिन मैं कोई नहीं…
नन्हा सा जब रहा गर्भ में, माँ ने मुझे दुलार दिया ।
आया जब इस मृत्युलोक में, तब दिन-दिन मुझको प्यार किया ।।
मेरी हर एक परछाई को भी, विपदाओं से बचा लिया ।
आंच न आने दी मुझ पर, हर संकट खुद पर सजा लिया ।। ….. 1
मैं भी खुदगर्ज रहा कितना, अपने से आगे बढ़ा नहीं ।
माँ ने संघर्ष किया जितना, उस पर भी तो मैं खरा नहीं ।।
क्या मेरी यही महत्ता है, माँ की ममता का दुत्कार करू ।
बेशक मैं बडा अभागा हूँ, जो माँ से ऐसा व्यवहार करूँ ।। .….2
धागा बांध कलाई पर, बहनों ने जो प्यार दिया ।
रहा नहीं पीछे तब मैं भी, मैंने उनका सत्कार किया ।।
रक्षा का बीणा उठा लिया, और वचन बड़े दे डाले थे ।
क्या सचमुच मैं इतना अटल रहा, जब संकट आने वाले थे ।। ….3
अनुराग की चाह जागी मन में, जब व्यसनों से आकृष्ट हुआ ।
प्रियतमा ही ढाल बनी जग में, मैं जब जब पथ से भ्रष्ठ हुआ ।।
तरुणाई में भी सामर्थ्य रही, जब तक वनिता अनुयायी थी ।
जब आँख खुली सपना टूटा, वो गैरों की परछाई थी ।। ….4
जीवन में संघर्ष बढ़े, तब अपना हाथ बढ़ाया था ।
मैं अडिग रहूँ अपने पथ पर, मुझको ये पाठ पढ़ाया था ।।
जब भी निस्तत्व रहा जीवन, तब तब मुझको सुलझाया था ।
पत्नी के घने गेसूओं ने, मेरा सामर्थ्य बढ़ाया था ।। …..5
बेटी को जब लिया गोद में, ये जीवन मेरा धन्य हुआ ।
मेरे आलय का हर कोना, पदार्पण से उसके पुनीत हुआ ।।
करुणा से हृदय भरा मेरा, मैंने जब गले लगाया था ।
जीवन मेरा धन्य हो गया, जब मैंने उसको पाया था ।। …..6
जीवन की ये राह क्लिष्ट, मैं बैसाखी का शरणागत ।
भरा हुआ मैं अहंकार से, फिर भी वामा का परिचारक ।।
मैं करता रहूँ गुमान स्वयं पर, मैं, मैं हूँ और कोई नहीं ।
सचमुच व्यर्थ है जीवन मेरा, नारी बिन मैं कोई नहीं ।। …..7