सूखी टहनियाँ
शरद ऋतु अपने चरम पर थी। उत्तर भारत में शरद ऋतू का चरम पर पहुंचना दिसम्बर के महीने से ही शुरू हो जाता है, और दिसंबर पार करके जनवरी पहुंचते-पहुंचते यह अपने शिखर पर पहुंच जाती है। अंधेरे कमरे में सन्नाटा पसरा हुआ था, घड़ी की सुइयों की टिक-टिक की आवाज़ साफ् सुनाई दे रही थी। अंधेरे में ही बिस्तर पर टटोलते हुए प्रकाश ने अपने मोबाईल फोन की स्क्रीन को ऑन करके समय देखने की कोशिश की, तभी बगल में सोई हुई पत्नी अनुपमा ने धीरे से कहा कितनी बार समय देखते हो आप, नींद नहीं आ रही है क्या? अब तक तीन बार तो मैंने ही देखा है आपको समय देखते हुए। नहीं देख रहा था कि सैर का समय हुआ है कि नहीं आज तो बाहर सड़क से मोटर वाहनों की आवाज़ भी नही आ रही है, प्रकाश ने धीरे से उत्तर देते हुए कहा।
रोजाना की तरह ही प्रकाश ने नित्यकर्म से मुक्त होकर, ठंड की भीषणता का आभास करते हुए हाथों में दस्ताने, बदन पर स्वेटर और उसके ऊपर जैकेट पहन लिया। सर पर गरम टोपी लगाते हुए, गरम पेंट और जूते पहने जिसके अंदर उसने गरम मौजे भी पहन रखे थे। चलते-चलते कानों पर मफलर बांधते हुए इतनी भयानक ठंड में भी वह सुबह-सुबह टहलने के लिए निकल पड़ा। प्रकाश की दिनचर्या और खानपान इतना संतुलित था कि आज 63 साल की उम्र में भी वह 50 का नजर आता था। उसको यह टहलने का शौक आज से लगभग 25 साल पहले पढ़ा था जब वह अपनी अधेड़ उम्र में था। काम की व्यस्तता और तनाव के कारण एक दिन उसे चक्कर आने की वजह से वह अपने ऑफिस की कुर्सी से खड़े होते समय अचानक लड़खड़ाकर फर्श पर बेहोश होकर गिर पड़ा और जब उसे होश आया तब वह अपने परिवार जिसमें दो बेटे वरुण और प्रवीण, उसकी पत्नी अनुपमा के साथ अस्पताल में नजर आया। वहाँ पर उसके ऑफिस के कुछ सहकर्मचारी भी थे, जो उसे अस्पताल तक लेकर के आए थे, और उन्होंने ही उसके घरवालों को अस्पताल आने की सूचना दी थी। सूचना पाते ही उसकी पत्नी अनुपमा दौड़ी-दौड़ी बच्चों को साथ लेकर अस्पताल पहुंची। बच्चों को घर पर छोड़कर जाना उसने उचित नहीं समझा क्योंकि अभी कुछ महीने पहले ही वह अपना गांव छोड़कर बच्चों की अच्छी पढ़ाई की उम्मीद लेकर शहर आकर साथ रहने लगी थी, और अब तक यहाँ पर उसकी किसी से इतनी अच्छी जान पहचान भी नहीं हो पायी थी कि वह अपने बच्चों को उसके पास छोड़ सके। प्रकाश को अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा देख अनुपमा के होश उड़ गए और दोनों बेटों का रो-रो कर बुरा हाल हो रहा था। तभी डॉक्टर ने आकर उन्हें ढाँढ़स बंधाया और कहा कि कुछ नहीं बस इनको थोड़ी सी कमजोरी और तनाव है उसी की वजह से चक्कर आ गए थे। आपको ज्यादा चिंतित होने की कोई जरूरत नहीं है। बस थोड़ी सी सुबह की सैर और खानपान का ध्यान रखने भर से इन्हें भविष्य में इस तरह की कोई परेशानी नहीं होंगी। डॉक्टर इतनी सी हिदायत देकर कमरे से बाहर चला गया। डॉक्टर के भरोसे भरे शब्द सुनकर अनुपमा ने राहत की सांस ली।
उसके बाद अगले दिन से ही प्रकाश ने सुबह-सुबह हर हाल में रोजाना सैर के लिए जाने की मन में ठान ली और वह अपनी इस दिनचर्या को पिछले 25 सालों से निरंतर निभा रहा था लेकिन पिछले 3 साल में, जब से वह अपनी नौकरी से सेवानिवृत्त हुआ था, तब से जीवन की दिनचर्या ही बिगड़ गई। हमेशा की तरह ही वह रोज सुबह उठकर टहलने के लिए जाने की हर संभव कोशिश करता और अधिकतर वह इसमें सफल भी रहता। लेकिन अब उम्र का असर इस कदर दिखाई देने लगा था कि वह इस बार की प्रचंड ठंड में अपने आप को कमजोर सा महसूस करने लगा था। वह अपनी पत्नी को हमेशा ही घर पर छोड़कर सैर के लिए जाया करता था। आज भी वह सैर के लिए निकला लेकिन आज उसकी तबीयत आगे बढ़ने के लिए गवाही नहीं दे रही थी। जैसे-जैसे वह आगे बढ़ता गया, ठंड उसको जकड़ती ही चली गई।
अब और आगे की तरफ बढ़ पाना उसे लगभग असंभव लग रहा था लेकिन पीछे की तरफ जाना तो उससे भी कठिन था, क्योंकि वह घर से काफी दूर निकल आया था। तभी उस धुंधले से वातावरण में उसे आगे की ओर धुएं का एक गुबार सा उठता हुआ दिखायी दिया। उसके मन में आशा की एक किरण जगी कि क्यों न शरीर को थोड़ा गरम कर लिया जाय उसके बाद शायद कदम आगे बढ़ने की हिम्मत स्वतः ही दिखाने लगेंगे। नजदीक पहुँचने पर देखा कि कुछ लोग इस हड्डियों को गला देने वाली भीषड़ ठंड में शरीर को ठंड से बचाने के लिए अलाव का सहारा ले रहे थे। जलती आग देखकर राह चलते राहगीर भी हाथ सेकने के लिए आग के पास आकर खड़े होते जा रहे थे। प्रकाश ने हिम्मत करके अपने आपको वहाँ तक पहुँचा लिया और लोगों के बीच में से निकलकर आग के नजदीक जाकर खड़ा हो गया और अपने शरीर को गरम करने लगा। ठंड इतनी भीषड़ थी कि आग को अपने आगोश में लेती जा रही थी और उसे पनपने का नाम ही नहीं लेने दे रही थी। अभी तक शरीर को थोड़ी सी गरमाहट मिली ही थी कि आग सिमटने लगी। तभी भीड़ में से किसी ने आवाज लगायी कि पीछे से थोड़ी सी सूखी टहनियाँ लेते आइए, आग बुझने वाली है। तभी प्रकाश का ही हमउम्र एक आदमी पीछे अंधेरे में से निकलकर टहनियों का गट्ठर लेकर आता हुआ नजर आया। उस आदमी और सुखी टहनियों के गट्ठर को देखकर प्रकाश खयालों में खो गया।
आज पूरे पाँच वर्ष होने को हें जब से वह अपने दोनों बेटे वरुण और प्रवीण से नहीं मिला था। मिलता भी कैसे दोनों विदेश में जो थे। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद दोनों को नौकरी भी उधर ही मिल गई थी और अपनी जिम्मेदरियों से छुटकारा पाने के लिए प्रकाश ने दोनों की शादी भी अपनी सेवनिव्रति से पहले ही कर दी थी। लेकिन मिलने की आशा की किरण तो तब जगी जब सेवनिव्रति का समय नजदीक आ गया था। सोचा दोनों बेटों से मुलाकात अवश्य ही हो जाएगी। लेकिन एक शाम पत्नी अनुपमा ने बताया कि आज वरुण का फोन आया था, कह रहा था कि पापा के रिटाइरमेंट पर आना तो मुश्किल लग रहा है लेकिन मैंने और प्रवीण ने सोचा है कि बाद में कभी आकर आप दोनों को सरप्राइज़ देते हैं। बेटों के न आने की बात सुनकर दोनों दम्पत्ति को धक्का सा लगा लेकिन वहाँ की परिस्थितियों के बारे में हमें क्या पता है? यह सोचकर दोनों दम्पत्ति ने अपने मन को समझाया और कार्यालय के लोगों के साथ ही मिलकर रिटाइरमेंट का कार्यक्रम पूरा कर लिया। रिटाइरमेंट के बाद जिंदगी में जैसे खाली पन सा आ गया था, दिन काटना भी मुश्किल हो जाता था। कभी-कभी तो प्रकाश अखबार भी दो-दो बार पढ़ लेता था। लेकिन उसके बाद क्या? अनुपमा का समय तो मोहल्ले की औरतों के साथ हंसी-मजाक करके भी पास हो जाता था लेकिन प्रकाश का समय पास करना तो दिन व दिन कठिन होता जा रहा था। उसके मोहल्ले में कोई अच्छे दोस्त भी नहीं थे जिनके साथ वह अपना समय काट सके सुख दर्द बाँट सके। एक दो थे भी उनकी दिनचर्या बिल्कुल अलग थी। अब उसे अपनी जिंदगी से घृणा होने लगी थी। उसके पास खुद को तसल्ली देने के लिए कोई ऐसी विस्मृतियाँ भी नहीं थी कि वह अपने आप से कह सके कि जिंदगी में तूने खुद के लिए यह किया है।
प्रकाश गहरी सोच में डूबा हुआ ही था कि उसकी चेतना वापस आने लगी उसे फिर से ठंड का एहसास होना शुरू हो गया। उसने अपने चारों तरफ गर्दन घुमाकर देखने की कोशिश की तब समझ में आया कि उसके साथ रुककर हाथ सेकने वाले अधिकतर लोग जा चुके थे और दूसरे लोग आकार हाथ सेक रहे थे। अलाव की बुझती हुई आग देखकर फिर से भीड़ में से किसी ने आवाज लगाई कि आग बुझ रही है सुखी टहनियों का एक गट्ठर ले आइए। आवाज सुनकर प्रकाश की चेतना पूरी तरह जाग चुकी थी। काफी समय हो चुका था अनुपमा उसका इंतजार कर रही होंगी। तुरंत ही उसने घर वापस लौटने का निर्णय लिया।
अलाव की बुझती आग से वह अपनी जवानी की कहानी को जोड़कर देखने की कोशिश करने लगा। उसे अपना जीवन भी इस अलाव की बुझती हुई आग सा नजर आने लगा। सारी जिंदगी वह इस अलाव की तरह ही दूसरों के लिए जलता-बुझता रहा, कभी रिश्ते-नाते निभाते हुए, कभी बच्चों की परवरिश, कभी उनकी उच्च शिक्षा और फिर समाज की होड़ में उन्हें विदेश भेजकर अपने उज्ज्वल भविष्य की आशा करने लगा था। उसका यह आशा करना उसे अब फीका नजर आने लगा था। अब वह अपना और अधिक समय बर्बाद नहीं करना चाहता था। अब उसकी समझ में आ गया था कि उसे बाकी की बची हुई जिंदगी का एक पल भी बर्बाद नहीं करना चाहिए और ना ही समाज की परवाह, उसे ना ही अपने बच्चों पर निर्भर होने की जरूरत है और ना ही किसी की तरफ् आशा की नजरों से देखने की। उसे अब ना ही धन संचय की जरूरत है और ना ही किसी को धनवान बनाने की चाहे वह उसकी खुद की औलाद ही क्यों न हो। ठंड का प्रकोप अभी तक उतना खास कम नहीं हुआ था लेकिन उसके अंदर आत्मविश्वास की ऊर्जा भर आयी थी। तुरंत ही उसने घर की तरफ वापस लौटने के लिये कदम बढ़ाए। अभी दो कदम आगे ही बढ़ा था कि अलाव के पास खड़े लोगों मे से किसी ने आवाज़ लगाई कि आग बुझने वाली है कोई पीछे जाकर सुखी टहनियाँ लेकर आ जाइए। एक पल ठहरकर उसने पीछे मुड़कर देखा, फिर मुस्कराया और तेजी से घर की तरफ बढ़ चला।