माँ का संदेश
माँ बनने का अंदेशा जब, खुशियों का संदेशा लाया ।
माँ बनने के अनुभव में मैंने, नव जीवन का दर्शन पाया।।
मैं भी अब मातृत्व छाँव की, छतरी को फैलाऊँगी ।
हरपल हरदम तेरी सूरत, मूरत खुद से दोहराऊँगी ।।
गलती तेरी मेरी होगी, पीड़ा मैं स्वयं उठाऊँगी ।
दर्द तुझे हो उससे पहले, मैं भागीदार बन जाऊँगी ।।
मेरे तन-मन का टुकड़ा तू, ना तुझे दूर कर पाऊँगी ।
माँ हूँ मैं, माँ बनकर, अपना हर फर्ज निभाऊँगी ।।
तेरे दुख और दर्द में मैं, स्वयं शरीक हो जाऊँगी ।
तू मेरे तन का टुकड़ा है, मैं तुझकों नहीं सताऊँगी ।।
गर दर्द मेरा भारी तुझ पर, तू अपनी मर्जी का मालिक ।
मुझे मेरे दर्द में रहने दे, मैं तुझ पर बोझ न बन पाऊँगी ।।
तू तो नादान है मेरे लिए, मैं कैसे यह भूल पाऊँगी ।
आखिरी अपने कतरे तक, मैं अपना फर्ज निभाऊँगी ।।
मैं पास रहूं या दूर रहूं, तू ही हरपल है याद मुझे ।
तू तो मेरा कतरा ही है, याद तेरी हर एक फ़रियाद मुझे ।।
मैं हूँ दुख में या सुख में हूँ, तू मेरी कोई याद न कर ।
तू हँसता है मैं हँसती हूँ, मेरे दुख-दर्द तू याद न कर ।।
तू खुश है गर मेरे बिन ही, तू बेशक मेरी याद न कर ।
माँ हूँ तेरी यह फर्ज मेरा, तू अपना फर्ज अदा कर न कर ।।