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आज़ादी की अमृत गाथा


पीड़ियों ने हमारी गुलामीं की जकड़ में, गुजारी जिंदगी अपनी ।

सहे बेहिसाब अत्याचार, गुजारी जिंदगी जहालत में ।।

मगर आज़ादी का जज्बा, जंगलो में भी रहकर नहीं छोड़ा  ।  

छोड़ा महल, घर द्वार अपना, मगर हौसला नहीं तोड़ा ।। …..1

सन् सत्तावन याद हमें, वीरों ने मन में ठानी थी ।

दुश्मन तोपों से लैस उधर, मां भारती की इधर संताने थी ।।

बंदूकें दुश्मन ताने था, वो सीना ताने अड़े हुए ।

हिंदोस्तां की शान में, ले जान हथेली खड़े हुए ।। …..2  

कितनों ने सीने पर गोली खाई, कितनों ने फंदे चूम लिए ।

कितनों ने कटाये सर वतन की खातिर ,कितने प्यासे मर गए जेलों में वतन के लिए ।।

रहा संघर्ष अविरत, पीड़ियों की कुर्बानियाँ हुईं ।

हमें अपने वतन में, तब जाकर हासिल जिंदगानियाँ हुईं ।। …..3   

मिली आज़ादी मगर, गुलामी की जंजीरें पुरानी थी ।

तोड़कर बंधन हमें, अपनी दास्तां खुद बनानी थी ।।

मिले विधि-विधान अपना, संस्कृति की हमें हो आजादी ।

सपनों सा रहे हिन्दोस्ता, मेरे वतन की हो आबादी ।। …..4   

रहें स्वाधीन हम सब, सब धर्मों का सम्मान करें ।  

मानवता का अवमान न हो, ऐसा हम प्रावधान करें ।।

नारी की हर घर इज्जत हो, ऐसा दृढ़ संकल्प करें ।

उंच-नीच हम भूल सभी, एक दूजे का उपकार करें ।। …..5 

आत्मनिर्भर हो भारत का, हर एक व्यक्ति ।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, बने वह दुर्गा और शक्ति ।।

हम लिखें तरक्की के नए, आयाम हर दिन ।

वतन का विश्व में, ऊंचा करें स्थान हर दिन ।। …..6 

सद्भावना, सुख और शांति की गंगा बहाएंगे ।

वतन का विश्व में, ऊंचा परचम लहराएंगे ।।  

प्रकृति की रक्षा का बीड़ा, हम भारती उठायेंगे ।

आजादी का अमृत महोत्सव, शान से ऐसे मनाएंगे ।। …..7


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